प्रकृति और दानव

                      प्रकृति और दानव

दुर्गा सप्तशती में जो व्याख्यान मिलता है की किस प्रकार एक असुर अपने लोभ से लालायित हो पूरे विश्व पर अधिकार करने लगा। उसने कई सिद्धियां एवं शक्तियां प्राप्त कर ली ताकी वह अजीत ,अमर और सर्वशक्तिवान बन पूरे विश्व पर राज कर सके।  
असुर का घमंड बढ़ता ही गया और उसने धीरे धीरे सभी देवताओं को वश में करना शुरू कर दिया अग्नी देव, वरुण देव, पवन देव, इंद्र देव, मेघ देव सभी अपने सिंहासन छोड़ भागे और असुर एक एक कर उनके कार्यभार को अपने आधीन करने लगा। 
पूरा स्वर्ग लोक जब असुर के आधीन हो गया तो पूरा विश्व त्राहिमाम त्राहिमाम करने लगा।
इसपर सभी देवगण इकठ्ठा हुए और एक देवी का आवाहन किया, जब देवी प्रकट हुई तो सभी देवताओं ने उन्हें अपने अस्त्र शस्त्र और शक्तियां सौंप दी। देवी ने विकराल रूप लिया और महिष की भेष में छुपे असुर का अंत कर सभी को मुक्त किया।
ये कहानी हम सभी ने सुनी है परन्तु अगर हम इसका गहन अध्यन करें तो हम पाएंगे कि ये कहानी प्रकृति और घमंड में डूबे उस हर मनुष्य के बीच द्वंद की है जो आज प्रकृति के विनाश का कारण में अपना योगदान दे रहे है और दानव के समान प्रकृति का हनन कर रहे है।
         आज के समय में कौन है ये दानव

ये दानव या असुर कोई और नहीं बल्कि वो सभी मनुष्य है जो अपने लाभ के लिए प्रकृति का निरंतर विनाश किए जा रहे। आज अगर भारत की स्थिती देखें तो लगभग हर बड़े जंगलों को काटा जा रहा है और उसका विनाश किया का रहा है। विकास के नाम पर प्रकृति का दोहन आम बात हो गई है। और ये केवल चंद लोगों के लोभ के कारण हो रहा है। इसमें सबसे पहले तो इस देश की सरकार है और उसके बाद बड़े व्यवसाई। 
जिस प्रकार महिषासुर घमंड में आकर प्रकृति का विनाश करने लगा था आज उसी प्रकार ये लोग भी कर रहे है। जंगलों को तबाह कर रहे है , पहाड़ों, नदियों, झीलों को खत्म कर रहे है। धर्म की आड़ लेकर ये नित नई नई विनाश की रूप रेखा तैयार कर रहे है और देश की एक बड़ी आबादी इनका गुणगान कर रही है।
अब तो ये खुद को भगवान साबित करने में लगे है जैसे महिषासुर को घमंड था इनको भी है। पर प्रकृति के आगे न किसी धर्म की चली है न किसी घमंडी इंसान की। आज प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखाना आरंभ कर दिया है पृथ्वी का ताप बढ़ता जा रहा है और जीव जंतु झुलस रहें है। 
                   कैसा होगा अंत 

कुछ मनुष्य के दंभ और लोभ के कारण पूरे विश्व को इसके प्रकृति के विकराल रूप का सामना करना पड़ेगा। लेकिन कुछ अच्छे लोगो के प्रयास से इस पृथ्वी को पुनः स्वर्ग बनाया जा सकेगा। दंभियो का अंत होगा और संसार में अच्छे लोगो के प्रयास से एक नवीन युग का आरंभ। कहानी के सार का अर्थ जिसमे दुर्गा को सभी देवताओं ने नमन किया और अपनी शक्तियां सौंप दी यह है की अग्नि हो जल हो वायु हो या आकाश सभी इस प्रकृति का ही हिस्सा है और सभी को शक्ती भी प्रकृति द्वारा ही प्राप्त है। लेकिन जब इनका अत्यधिक दोहन होना प्रारंभ होता है तब प्रकृति इन सभी ऊर्जाओं को साथ लेकर प्रहार करती है जिससे बचना किसी के लिए संभव नहीं। 
आज वातावरण की जो स्थिति है उसे हम सब देख सकते है, कभी तपती गर्मी है तो कभी अत्यधिक वर्षा , कभी कहीं तूफान है तो कहीं सुखाड़ है। ये सभी प्रकृति के क्रोध का ही कारक है। तो प्रकृति को साथ लेकर चलने में ही भलाई है ताकी हम अपना जीवन संतुलित और सर्वोतम बना सके।
                          कार्य 

आज से हमें निर्णय करना है कि हम प्रकृति की क्षरण में योगदान न देकर उसके पोषण में योगदान दे। प्राकृतिक प्रदत वस्तुओं का संयोजित, संतुलित और सहज रूप से व्यवहार करें। हम अपने जीवन कल में कम से कम एक लाख वृक्षों को लगाए, समुचित मात्रा में जल का उपयोग करें। हम उतनी ही वस्तुओं का उपयोग करे जितने की आवश्यकता हो। जनसंख्या कम करने में अपना योगदान दे ओर जीव जंतुओं की सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहें। कूड़े करकट का निपटारण स्वयं करे और कम से कम वस्तुओं का उपयोग करें।
ये सब छोटे छोटे प्रयास से हम धरती को स्वर्ग बना सकते है।


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