प्रकृति या विकृति
प्रकृति या विकृति ये दोनों ही शब्दों में बस अंतर एक अक्षर और मात्रा का है, किन्तु दोनो ही शब्द एक पुरे दृश्टिकोण को बदल देती है। प्रकृति जहाँ मनुष्य का गुण होती है वही विकृति उस विशेष गुणों की शत्रु। आज हम अधिकतर विकृतिओं को अपने जीवन में महत्व दे रहे है और अपने मूल प्रकृति से दूर भाग रहे हैं। इसीकारण हम आज सब कुछ होते हुए भी परेशान है और रो रहे हैं। जबकि देखा जाये तो आज के युग के मनुष्य के पास अपने जीवन को सुगम बनाने के लिए बहुत से साधन उप्लब्ध हैं, किन्तु फिर भी आज हम अधिक उदासीन हैं। जबकि हमारे पूर्वजो के पास जीवन यापन के लिए इतनी सुगमता उपलब्ध नहीं थी, परन्तु फिर भी वे हमसे अधीक प्रसन्नचित्त थे। जानना चाहेंगे ऐसा क्यों था , ऐसा इसलिए था क्योकि वो अपने प्रकृति के निकट थे।...